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Friday, 31 March 2017

भ्रस्टाचार के दल दल में और खो रहे है, विद्यालय अपनी गरिमा

दिल्ली, सुनील चतुर्वेदी - शिक्षण संस्थान जो पहले के समय में शिक्षा के मंदिर की तरह पूजे जाते थे, आज वो डूब रहे है, भ्रस्टाचार के दल दल में और खो रहे है अपनी गरिमा, शिक्षक और विद्यार्थी में पहले के समय में बनते आत्मीय संबंधो को व्यावसाय में बदलते जा रहे है आज अपने आस पास भी नजर डाले तो तमाम उदाहरण आपको मिल जायेंगे 

कमीशनबाजी का खुला खेल 
आज गला काट व्यावसायिक प्रतियोगिता में प्रकाशक स्वयं अपने एजेंट के द्वारा सभी स्कूल और शिक्षण संस्थानों में अपनी पकड़ बनता है, और इसमें सबसे ज्यादा काम करता है, मिलने वाला कमीशन, कुछ विद्यालय खुद इन मामलो को देखते है, और कमीशनबाजी का हिस्सा पाते है, जो विद्यालय इनसे दूर रहते है, उस स्थित में ये एजेंट वहाँ पढ़ाने वाले शिक्षको के माध्यम से अपना हित साधते है 

सम्बंधित बोर्ड के मानको की उड़ाते धज्जिया 
विज्ञापन के समय तो सम्बंधित बोर्ड को तो बताते है, लेकिन उनके मानको से उनका कोई लेना देना नहीं होता, मानक मिलने के बाद सारे मानक उनके खुद के होते है, उदाहरण के तौर पर C. B. S. E. बोर्ड से जुड़े विद्यालयों को N. C. E. R. T. की पुस्तके ही प्रस्तावित होती है, लेकिन होती बहुत ही कम जगह है, अक्सर अपने हित के प्रकाशक संस्थान की ही लागु मिलेंगी 

टैक्स की बड़ी चोरी 
ये सभी किताबे अभिवावक को या तो स्कूल से ही लेनी होती है, या उनके द्वारा बताये दुकानदारो से ही मिल सकती है, जिसमे अभिवावक कोई छूट भी नहीं ले सकता, और उस नकद लिए गए पैसो की कोई रसीद भी नहीं उपलब्ध कराई जाती, उस सभी बिक्री पर लगने वाला *"अरबो खरबों"* का एक वर्षीय सरकारी टैक्स भी मिल बाँट कर ख़त्म कर दिया जाता है,

पर्यावरण को घातक नुकसान 
सभी स्कूलो को मान्यता लेते समय छात्र पुस्तकालय को दिखाना पड़ता है, किन्तु मान्यता मिलते ही वो पुस्तकालय अद्रश्य हो जाता है, उदाहरण के तौर पर केंद्र सरकार स्वयं द्वारा संचालित जवाहर नवोदय विद्यालय में उपलब्ध पुस्तकालय से प्रत्येक छात्र को पुस्तके उपलब्ध करवाती है, जिसको छात्र को साल भर पढने के बाद अच्छी स्थित में पुस्तकालयों को वापस भी जमा करवानी होती है, जो बाद में दुसरे छात्र को दे दी जाती है, ख़राब रख रखाव से ख़राब हुई पुस्तको के मूल्य उस छात्र से जुर्माने के रूप में जमा भी करवा लिए जाते है, जिससे अच्छे रख रखाव का संस्कार छात्रों में आता है, लेकिन अक्सर विद्यालयों द्वारा प्रति वर्ष सभी कक्षाओ की पुस्तके बदलने से वो दुसरे आगे आने वाले क्षात्रो के काम न आकर कबाड़ का रूप ले लेती है, जिससे अच्छे संस्कार नहीं पनप पाते, और वो बेकार हुई पुस्तके अर्थहीन हो जाती है, और पुनः लाखो पेड़ो के कटने का कारण बनती है 

नकद लेनदेन 
ये सारे काम नकद लेंन देंन से ही होते है, केंद्र सरकार द्वारा डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा न देकर उसको हतोत्साहित करने का काम कर रहे है, और नकद लेंन देंन से सरकारों को प्रत्येक वर्ष अरबो खरबों का चूना लगा रहे है, इसपर सख्त लगाम लगाने की आवश्यकता है 

गरीबो के  हक का दोहन        
सरकार मान्यता देते समय इस बात का अनुबंध भी करती है, कि उस विद्यालय में कुछ गरीब छात्रो को  निशुल्क या बेहद कम फीस में सीट शिक्षा उपलब्ध करवाएगी, किन्तु ऐसा होता नहीं, वो स्कूल उन सीटो को भी भर कर सिर्फ अपनी जेब को भरने का काम करती है 
                       
   
   

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