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Sunday, 12 March 2017

मोदी की सुनामी मे हुए नुकसान का आंकलन करते रहे विरोधी

फतेहपुर, शमशाद खान । भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के साथ पार्टी को मिले प्रचण्ड बहुमत के आगे सपा की पंचर हुयी साईकिल व बसपा के बैठे हांथी पर गली चैराहों के साथ-साथ दोनों ही पार्टियों के पदाधिकारियों के अलावा कार्यकर्ता इस हार का आंकलन करते हुए दिखाई दिये। भारी भरकम जीत किसी भी सूरत इन पार्टियों के गले ही नहीं उतर रही है। ऊपरी मन से भले ही दोनों ही दलों ने इसे जनता जनार्दन का फैसला जरूर करार दे दिया है लेकिन अपने पराम्परागत वोट बैंक मे हुयी सेंधमारी को लेकर यह सभी सर पकड़े दिखाई दिये। बात सिर्फ प्रत्याशियों की ही नहीं बल्कि इस हार के लिए जवाबदेह बसपा तथा सपा के जिलाध्यक्षों के साथ पूरी कार्यकारिणी कल शाम से ही हार के मंथन मे जुट गयी। इशारे साफ हैं कि जल्द ही दोनों पार्टियों की जिला कार्यकारिणी को सुप्रीमों तलब कर सकते हैं तथा परम्परागत हुयी वोट बैंक मे हुयी सेंधमारी के बावत जो सवाल उनसे होने वाले हैं उसको लेकर अभी से इनका सिर चकराने लगा है।
बताते चले कि जिले की सभी सीटों पर भाजपा ने अपने प्रतिद्वंदियों को करारी शिकस्त दी है और तीन सीटों पर हार जीत का अन्तर पचास हजार के ऊपर रहा है। जनपद की सीटों मे कई ऐसी सीटें हैं जहां बसपा तथा सपा दोनों ही पार्टियों का परम्परागत वोट बैंक प्रत्याशी की जीत मे अहम भूमिका निभाता है। बावजूद इसके न तो प्रत्याशी का जातीय वोट और न ही पार्टी का बेस वोट इन दोनों ही राजनैतिक दलों के काम आया। बात अगर सदर विधानसभा की जाय तो यहां भाजपा के विक्रम सिंह ने सपा के प्रत्याशी चन्द्र प्रकाश लोधी को तीस हजार से अधिक मतो से पिछ़ाड दिया। जानकारों की माने तो इस विधानसभा सीट पर चन्द्र प्रकाश के भारी भरकम जातीय वोट बैंक के साथ-साथ सपा का परम्परागत यादव तथा मुस्लिम वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभा सकता था। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि सपा प्रत्याशी जहां अपना ही जातीय वोट बैंक पाने मे असफल रहे तो वहीं सपा का परम्परागत वोट बैंक भी स्लिप करता दिखाई दिया। कई जानकार इसे पिछले दो महीनों मे सपा के अन्दर चल रही अन्तरकलह का नतीजा मान रहे हैं तो कई यह भी कहने से नहीं चूक रहे हैं कि नाराज कार्यकर्ताओं ने सपा का साथ नहीं दिया। इसी तरह बात अगर बसपा की हो तो पार्टी के आला पदाधिकारी नाम न छापने की शर्त पर यहां तक कहते हुए दिखाई दिये कि हमारा बेस वोट पूरी तरह से भाजपा को वोट कर गया तथा जातीय वोट उनके प्रत्याशी को नहीं मिला। 
बताते चले कि उत्तर प्रदेश मे भाजपा को रोकने के लिए सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था वहीं बसपा ने सूबे की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये थे। मतगणना पूर्व आंकड़ों पर भी विश्वास न करते हुए इन पार्टियों ने इमरजेंसी एकजिट द्वारा खुला रखा था तथा सपा बसपा गठबंधन की खबरें भी फिजाओं मे उड़ी थी। हालांकि 11 मार्च को आये मतगणना के नतीजों के बाद यह पार्टियां फैसला ही नहीं कर पा रही कि हार का ठीकरा किसके सर फोड़ा जाये। जनपद मे सिर्फ सदर सीट ही नही बल्कि बिन्दकी, जहानाबाद से सपा प्रत्याशियों ने भी हार के कारणों के लिए परम्परागत वोट बैंक मे हुयी सेंधमारी को बताया। जनपद की सभी सीटो की अगर बात की जाये तो सपा ने जो प्रत्याशी चुनाव मैदान मे उतारे थे वो जातीय तथा पार्टी के परम्परागत वोट बैंक के हिसाब से जीते हुए माने जा रहे थे। मतगणना के पूर्व भी पार्टी पदाधिकारी व कार्यकर्ता इन्हीं का हवाला देकर लगातार अपनी साईकिल को लखनऊ की तरफ दौड़ाने की बात तो जरूर करते रहे लेकिन परिणामों ने सभी नींदें उड़ाकर रख दी। दोनों पार्टियों की जिला इकाईयों की माने तो जल्द ही पार्टी सुप्रीमो आपात बैठक बुलाकर इस हार का विश्लेषण कर सकते हैं। जानकारों के हिसाब से बसपा आगे अपना कैडर वोट बचाने के लिए पार्टी के आन्तरिक ढंाचे मे बड़ा फेरबदल कर सकती है। विश्लेषकों के अनुसार बसपा को इस चुनाव मे बाहरी प्रत्याशियों को तवज्जों देना काफी मंहगा पड़ा है। कल आये चुनाव नतीजों के बाद से ही जीत हार का विश्लेषण करने के लिए चाय की दुकानों समेत शहर के प्रमुख चैराहों के साथ-साथ जिलेभर की बैठकों मे लोग एकट्ठा रहे। 345 का प्रचण्ड बहुमत किसी भी विरोधी के जहां गले नहीं उतर रहा था वहीं ज्यादातर ने इसे विकास की जगह जातीय चुनाव का नाम दे डाला। कईयों ने आरोप लगाया कि जिस जादू की छड़ी के चक्कर मे जनता ने यह ऐतिहासिक बहुमत भाजपा को दिया है वह कितने काम आयेगा यह आने वाला समय ही बतायेगा। हालांकि एक बात तो तय है कि अब दोनों ही पार्टियां अपने पुराने कार्यकर्ताओं को तरजीह देकर दुबारा बूथ स्तर से पार्टी को खड़ी करने की कवायद शुरू कर सकती हैं। 

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