फतेहपुर, शमशाद खान। बाल विकास परियोजना के अन्तर्गत संचालित आगंनबाड़ी केन्द्रों में फर्जी बच्चों की संख्या पंजीकृत कर व गर्भवती महिलाओं के हक का पोषाहार जानवरों को खिलाया जा रहा है। आंगनवाड़ी केन्द्रों से संबोधित अधिकारियों की उदासीनता से सरकार की यह कल्याणकारी योजना अपने लक्ष्य से कोसों दूर होती जा रही है। इस योजना के तहत नौनिहालों गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली सुविधायें मात्र कागजों तक स्थिति होकर रह गयी है। सीडीपीओ की मिलीभगत से कार्यकमियों अपने हाजरी रजिस्टर को दुरूस्त किये रहती हैं और शिकायत होने पर जब उच्चधिकारियों द्वारा जांच होती है तो वही रजिस्टर कार्यकर्मियों व सीडीपीओ एवं सुपरवाइजर द्वारा जांच में गये अधिकारियों के सामने रख कर संतुष्ट कर दिया जाता है। सच तो यह है कि चाहे जिला प्रशासन हो या विभागीय अधिकारी सब इस योजना के तहत चल रहे केन्द्रों की सच्चाई जानते है कि बिना कार्य किये चाहे सीडीपीओं हो चाहे सुपरवाइजर या फिर कार्यकमी सारे लोग बिना कार्य किये वेतन उठा रहे है। और इस योजना के तहत आये धन का बंदरबाट कर मालामाल हो रहे है। जिससे शासन की मंशा पर पानी फिर रहा है। भले ही शासन गरीब परिवार के बच्चों को शारीरिक मानसिक विकास हेतु चाहे जिस तरह की योजना चलाये लेकिन सच तो यह है कि आज गरीब परिवारों का बच्चा वैसे ही अनपढ है जैसे कल था। शासन द्वारा आगनवाड़ी केन्द्रों मे ंजो पोषाहार भेजा जाता है। उस पोषाहार की कीमत प्रतिबोरी हजारों रूपये होती है। सुनकर बड़ा ताज्जुब होता है कि इतना महंगा पोषाहार पशु खा रहे है। कहते है प्रति केन्द्र से पोषाहार वितरण के दिन सीडीपीओ द्वारा पांच सौ रूपया लिया जाता है और कार्यकमियों अपनी जेब से भाड़ा देकर पोषाहार अपने केन्द्र तक लाती है तो अपने पास से खर्च किये गये रूपयों को वह कैसे वसूल करेंगी।
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