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Wednesday, 22 March 2017

गांव में बने मिनी सचिवालय बना अराजकतत्वो का अड्डा

फतेहपुर, शमशाद खान । बेमकसद साबित हो रहे है लाखों में बने मिनी सचिवालय रेख देख आभाव से दरवाजे खिडकियाॅ व पैनल व लाईट चोरी पिछले शाशन काल मे ंहर गा्रम सभा में बनी मिनी सचिवालय की इमारते लाखो रूपये में बन तो गयी पर जिस मकसद को लेकर यह मिनी सचिवालय बनाये गये थे कि ग्राम सभा की होते बैठक भी अब खुले मैदानों में स्कूलों में ना होकर इन मिनी सचिवालयो में होगी इन्ही सब बैठकों आदि के लिये सभी ग्राम सभाओं में मिनी सचिवालय बन तो गये पर आज तक किसी भी ग्राम सभा में इनका सही उपयोग वही हुआ है जब वन तर टैयार हुई और पैनल व सोलर लाईटे लगी जो शाम होते ही जलती थी जिनके नीचे बैठ कर गाॅवो के अराजकतत्व जुआ खेलते या ताश खेलते रहते है। धीरे-धीरे यही अराजकत्व और चोर प्रवत्ती के लोगों की नजर इन मिनी सचिवालयों पर लगी और इन मिनी सचिवालय किसी भुतहा कोठी की तरह वीरान पडे है इनकी राख रखाव ना ही ग्राम सभा के प्रधानों ने कोई रूचि दिखाई ना ही प्रशासन ने इसकी सुरक्षा के कोई इन्तजाम किये जब यह इमारते बन कर तैयार हुई थी तो इन इमारतो में दरवाजे खिड़कियाॅ व प्लास्टर सहित सब कुछ कम्पलीट था पर समय के साथ दरवाजे खिड़कियाॅ चोर ले गये और प्लास्टर व ईंटो में भी अब अराजकतत्वो की नजर लग गयी है कही कही तो लोहे के गेट भी गायब हो रहे है और ज्यादह तर मिनी सचिवालयो पर दबंग किस्म के लोगों का कब्जा है यह दबंग लोग इन मिनी सचिवालयो में भूसा लकड़ी व जानवर बाॅधते है ओर कहा इन मिनी सचिवालया में शाम होते ही अराजकतत्वों की भीड़ इकठा होती है और यह अराजकतत्व रात इन मिनी सचिवालयो में जुआ खेलते है व यही बैठकर शराब पीते है व गाॅव के शान्ती पूर्ण वातावरण में अशान्ती की बेल बोते है। और आने जाने वाली महिलाओं से अभद्रता तक करते है जहाॅ सरकार ने करोड़ो रूपये इन मिनी सचिवालयो में लगाये वही अगर एक चैकीदार या गाॅव के ही किसी जिम्मेदार को इस इमारत के हवाले कर दिया जाता तो शायद आज इन इमारतो की यह दर्दश ना होती पर आज शाशन की उदासीनता व प्रशासनिक लापरवाहो के चलते व ग्राम प्रधानो की ओछी मानसिकता के चलते यह मिनी सचिवालय की इमारते अपनी दुर्दशा पर आॅसू बहा रही है। क्यूकि ग्राम सभा के विकास के लिये खुली बैठको में लोगों को धूप बारिस व अन्य मौसम में बचाने के लिय यह मिनी सचिवालय बनाये गये लेकिन तहसील क्षेत्र में शायद ही कोई ऐसा गाॅव हो जहाॅ का विकास का एजेन्डा खुली बैठक में तय किया जाता हो जब किसी भी प्रधान को बैठक ही नही करनी तो मिनी सचिवालय की अवश्कता को भी नही समझा गया अगर शासन ने कोई ऐसा कदम या प्राविधान रखा होता कि खुली बैठक नही की गयी तो एजेन्डा मान्य नही होता तब शायद यह मिनी सचिवालय अपनी शान बने होते लेकिन सारे प्रपोजल प्रधानो के घरों में कमरे के अन्दर बैठ कर किये जाते है और गाॅव के या वार्ड के सदस्य तक को इसकी भनक नही लगती है जब मानसिकता हमारे समाज की बनी तभी इन मिनी सचिवालयो की यह दुर्दशा हुई और अब बची है जगह-जगह टूटे प्लास्टर वाली बगैर खिड़की बगैर दरवाजे वाली टूटी फूटी इमारत जिस पर सर्दियों में आवारा पशु अपना विश्रामगाह बनाये हुये है या फिर किसी दबंग की लकड़ी या भूखा या कन्डे या मवेशी बन्धे हुये है यह है हमारा मिनी सचिवालय 

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