फतेहपुर, शमशाद खान । जिला अस्पताल प्रशासन की शिथिंलता के चलते जहां मरीजों को सही ढंग से इलाज नहीं मिल पा रहा वहीं मुख्य गेट के अन्दर का परिसर अवैध एम्बुलेंस चालकों के कब्जे में है। दोपहर बाद से परिसर में एम्बुलेंस चालकों की फौज एकत्र होती हैं और पूरे कैम्पस में सिर्फ प्राइवेट एम्बुलेंस ही नजर आती है। सब कुछ सामने नजर आने के बावजूद अस्पताल के जिम्मेदार कुछ भी कर सकने में नाकाम है। मुख्य चिकित्साधीक्षक की शिथिलता और उनके यहां पर स्थाई तौर पर न रहने के चलते जिला अस्पताल पूरी तरह से अराजकतत्वों का अडडा बन गया है। ओपीडी में जहां चिकित्सकों के कक्ष में दवा कम्पनियों के प्रतिनिधि और दलाल कब्जा जमाये रहते हैं वहीं इमरजेंसी में भी ऐसे ही लोगों की आमद देखी जा सकती है। सीएमएस की सख्ती ओपीडी में बैठने वाले चिकित्सकों पर न होने के कारण उनका रवैया नियंत्रण से बाहर है। खुलेआम मरीजों को जहां बाहर की दवाएं लिखना इनकी आदत में शुमार है वहीं प्राइवेट जांचों को धड़ल्ले से बाहर के लिये लिखा जाता है। डाक्टरों के कक्ष में एक तरफ जहां दलालों का जमावड़ा वहीं दूसरी तरफ मुख्य गेट परिसर में प्राइवेट एम्बुलेंस चालकों का कब्जा बना हुआ हैं इन एम्बुलेंस चालकों का तालमेल अस्पताल कर्मचारियों से ही है और उन्ही की सह पर इनकी परिसर में इंट्री रहती हैं सीएमएस के न रहने व व्यवस्थाओं के प्रति उनकी उदासीनता ने जिला अस्पताल की अराजकतत्वों की गिरफ्त में सौंप दिया है। इलाज के लिये आने वाले मरीजों से ज्यादातर चिकित्सक सीधे मुंह बात करना तक मुनासिब नहीं समझते वहीं इनके आने-जाने का समय भी निश्चित नहीं है। दो दिन पूर्व ऐसी ही अव्यवस्थाओं के शिकार एक मरीज को इलाज के लिये घण्टे तड़पना पड़ा। भारी जद्दोजहद के बाद औपचारिकता पूरी करते हुए एक चिकित्सक ने इलाज की इतिश्री कर ली। मामला सीएमओ तक पहुंचा तो थोड़ी हलचल मची लेकिन अपने मनमाने रवैये के लिये मशहूर चिकित्सकों के आगे सीएमओ की भी दाल नहीं गल सकी। कोई ठोस कार्रवाई न होने के कारण चिकित्सक बेलगाम है। तो कर्मचारी भी पीछे नहीं है। आदर्श अस्पताल का दर्जा होने के बावजूद यहां पर आधारभूत सुविधाओं का टोटा पूरी तरह से बना हुआ है।
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