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Monday, 6 February 2017

चुनावी अखाड़े मे मतदाताओं के जातिवाद से पस्त होते प्रत्याशी

फतेहपुर, शमशाद खान । जिले की सदर विद्यानसभा में मुख्य राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों ने अपना-अपना नामांकन करा दिया है। फतेहपुर सदर से वर्तमान विधायक व भाजपा प्रत्याशी विक्रम सिंह, सपा से फतेहपुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष चन्द्र प्रकाश लोधी और बसपा से समीर त्रिवेदी मैदान में है। विक्रम सिंह अपने ढाई साल के कार्यकाल में कराये गये कार्यो की दुहाई देकर समर्थन व वोट मांग रहे है। जबकि जनता उनके कराए गये कार्यो के दावों को सिरे से खारिज कर रही है। वही केन्द्र सरकार के कार्य को भी जनता ने परख लिया है। वह जनता जो कल तक भाजपा व मोदी के साथ एक स्तम्भ की तरह खड़ी थी और मोदी सरकार की हिमायत में मरने मारने पर उतारू थी। प्रत्याशी घोषित होने के बाद से मोदी व भाजपा से उसका मोह भंग हो चुका है। क्योकि बसपा के प्रत्याशी समीर त्रिवेदी के मैदान में आ जाने से उन पर अपना पराया हावी हो गया है। यदि वह भाजपा की तरफ जाते है तो उनका अपना प्रत्याशी समीर त्रिवेदी हार सकता है। बढ़ी मुश्किल से इस चुनाव मे ंखाता खुलने के आसार दिखायी दे रहा है। तो जागरूक और सिद्वान्तवदिता का दम्भ भरने वाले लोग जातिवादी राजनीति का परचम लहराते हुए अपने प्रत्याशी के साथ खड़े नजर आ रहे है। बसपा प्रत्याशी की रणनीति सफल होती दिख रही हैं जहानाबाद से हार जाने के बाद बसपा प्रत्याशी का सदर विधानसभा से दाव लगाना मुफीद बनता जा रहा है। आरोप बसपा और सपा के परम्परागत वोट पर लगाया जाता है। कि यह मतदाता जातिवादी होता है। लेकिन सच देखना हो तो भाजपा के परम्परागत वोट की राजनीति पर गौर करे तो पायेगें कि अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए भाजपा को छोड़ने मे ंकोई हिचक नही करते दिख रहे है वही बसपा व सपा का परम्परागात वोट हमेश अपने मुखिया और चुनाव चिन्ह के साथ ही खड़ा दिखता है। पार्टी प्रत्याशी कोई भी हो। भाजपा का एक और परम्परागत वोअ जो कल्याण सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राजनीति करता है। वह भी भाजपा से खिसककार सपा के अपनी विरादरी वाले प्रत्याशी चन्द्र प्रकाश लोधी के साथ खड़े होकर जिताने के लिए कमर कसे हुए है। अब देखना है कि सिद्वान्तवादिता का झूठा मखौटा लगाने वाले अपने प्रत्याशी को जिता पाते है या फिर जिन पर जातिवादी राजनीति करने की तोहमत मढ़ते है। उनके प्रत्याशियों को जिता कर अपने विरादरी वाद को जिन्दा रखते है। जातिवादी व मौकापरस्ती की राजनीति का सच चुनाव के समय सही रूप से देखा जा सकता है। आदर्श व सिद्वान्त की राजनीतिक की तरफदारी करने वाले आज जातिवादी राजनीति के हमाम में नंगे होने के लिए कपड़े उतार फेकने को उद्यत है। बसपा और सपा पर जातिवाद का तो पहले से ठप्पा लगा है। जिनकी जातिवादी राजनीति तो सभी का मुद्दा होती है। लेकिन सिद्वान्तवादियों के फिसलने पर हो हल्ला भी लाजिमी है। 

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