फतेहपुर, शमशाद खान । तेइस फरवरी को हुयी वोटिंग के बाद अब जिले की छह विधानसभाओं की जीत और हार के आंकड़ों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म दिख रहा है। इसी के साथ ही तीनों तहसील व कचेहरी सहित दीवानी परिसर पर ग्रामीण इलाकों से आने वाले मुवक्किलों से भी चुनावी महासंग्राम मे कौन मुकाबले पर है इसकी टोह राजनैतिक गणितज्ञकार समेटने मे जरा भी चूक नहीं कर रहे हैं। अगर माहौल की बात किया जाये तो चाहे वह पान की दुकान मे या फिर चाय की या परचून की दुकान सभी स्थानों पर केवल चुनावी चर्चाएं बनी हैं। कहीं न कहीं चुनावी असर इस तरह हाबी है कि सड़कों पर जो रौनक होना चाहिए वह रौनक नजर नहीं आ रही है। चुनाव के बाद जल्द ही होली का त्यौहार सिर पर है और इस त्यौहार का जश्न सभी खेमों के लिए दुगना होगा जिस खेमे की जीत होगी लेकिन अभी चुनावी परिणाम की घोषणा 11 मार्च को होनी है इससे पहले कयासों के आधार पर कोई जश्न मनाने को तैयार मे नहीं है लेकिन यह बात निश्चित है कि चुनावी परिणाम की शुरूआत सुबह से शुरू हो जायेगी तो 11 मार्च की देर रात से होली का जश्न शुरू होगा और यह जश्न तीन दिनों तक थमने का नाम नहीं लेगा और यह मौका अब तक पड़ने वाले त्यौहारों मे होली पर पहला होगा जहां पर एक तरफ चुनावी परिणामों की खुशी होगी तो दूसरी तरफ होली पर्व की खुशी उसमे चार चाॅद लगाने का काम करेगा।
जिले की छह विधानसभा चुनावों के लिए बीते 23 फरवरी को मतदान हो चुका अब मतदान की प्रक्रिया खत्म होने के बाद राजनैतिक गणितज्ञकारों और समर्थकों की निगाहें परिणाम तिथि की ओर टिक गयी हैं लेकिन अभी नतीजे आने मे लगभग 12 दिन बाकी हैं और इससे पहले विधान सभावार नतीजों के नजदीक तक पहंुचने का कयास लगाने मे यह लोग अपने को पीछे नहीं छोड़ रहे हैं क्योंकि अनुमान के आधार और वोट प्रतिशत पर जीत की गोटें हर प्रत्याशी के समर्थक बिठाकर अपनी जीत को सुनिश्चित बता रहे हैं लेकिन इस बात की सच्चाई तक पहुंचने के लिए समर्थक और राजनैतिक गणितज्ञकार केवल अपने चहेते चेहरों से जीत का अनुमान लगाने की भूल नहीं कर रहे हैं बल्कि उन चेहरों को टटोलकर उनसे हकीकत की जानकारी लेने के लिए हर विधानसभा पर किसक चक्का कितनी तेज से घूमा है इसकी जानकारी या तो युवा वर्ग और या फिर निराक्षर यानी पढ़ा लिखा न होना और राजनीत से कहीं दूर-दूर तक उसका ताल्लुक नहीं है उसी से उसके मन की बात को टटोलने की कोशिश कर चुनावी जीत और हार का कयास लगाया जा रहा है। अगर हुसेनगंज विधानसभा की ओर बढ़े तो यहां पर चुनावी समीकरण मे कांग्रेस की प्रत्याशी ऊषा मौर्या के सामने भाजपा प्रत्याशी राणवेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ धुन्नी सिंह को कड़ी टक्कर देने का कयास लगाया जा रहा है और तो और इस बात पर भी जोर देकर कांग्रेस प्रत्याशी श्रीमती ऊषा मौर्या को इस तरह से मजबूत माना जा रहा है कि उनके समाज के साथ-साथ मुस्लिम समाज ने पूर्ण सहभागिता निभाने मे अगर किसी तरह की कोताही नहीं की है तो पिछले 2012 के विधानसभा चुनाव मे दूसरे पायदान मे रहकर 2700 से वोटो से शिकस्त पायी थी और कांग्रेस प्रत्याशी ऊषा मौर्या इस विधानसभा पर शिकस्त पाने के बाद भी अपने कार्यों पर प्रगति बनायी रखी। आम आवाम की मूलभूत समस्याओं के मामलों को लेकर बराबर संघर्ष करती रही कहीं न कहीं राजनीति मे अपने विधानसभा पर लगातार बने रहने का असर भी दूसरे जातियों के वोटरों को समेटने मे भी आगे मानी जा रही हैं फिर भी राजनीतिज्ञकार दूसरे पहलू पर भी कयास लगाने से नहीं चूक रहे हैं। भाजपा समर्थक व उस दल से सम्बन्ध रखने वाले राजनीतिज्ञ लोगों का मानना है कि किसी भी विधानसभा मे उस विधानसभा का प्रत्याशी नहीं बल्कि सीधे-सीधे देश के प्रधानमंत्री के चेहरे पर चुनाव हुआ है। 2012 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा जहां मतदान प्रतिशत बढ़ा है तो वहीं प्रदेश सरकार की नीतियों और उनके कार्यों से नाराज वोटरांे का भी फायदा सीधे-सीधे भाजपा को मिला है लेकिन अभी यह कहना ठीक नहीं है कि विधानसभा से कौन प्रत्याशी बाजी मारेगा क्योंकि पड़े मतदानों की संख्या मशीनों पर कैद है जिसका फैसला आगामी 11 मार्च को होगा और इसके बाद होली और चुनाव का जश्न एक साथ मानाया जायेगा।

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