दीपक मिश्र ( बाराबंकी ) -सपा और कांग्रेस का मिलन दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं का अवसरवादी गठबंधन... ठगे से रह गए पुराने समाजवादी ....
निगाहे झुका बैठे पुराने कांग्रेसी ...सत्ता की लालच और गिरते आत्मविश्वास को हासिल करने के लिए अपने दलों की मूल विचारधारा और सिद्धांत की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाते हुए यह साबित किया कि इस वर्तमान राजनीति में सत्ता ही सब कुछ है... हाशिए पर गई लोहिया और गांधी की शिक्षाएं.....
अपने इतिहास के सबसे कमजोर और बेबसी भरे दौर में दिख रही कांग्रेस की अंतिम उम्मीद उसके युवराज ने प्रदेश में लगभग एक चौथाई सीटों पर संतोष करके अखिलेश के नेतृत्व और व्यक्तित्व को अपने से कहीं अधिक काबिल मानते हुए समर्पण किया ....और इसके साथ ही देश को आजादी दिलाने वाली और देश में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी के आगे पूरे देश के सामने पस्त हो कर नतमस्तक हुई ......और यह दोनों दल भाजपा और मोदी नेतृत्व के भय से ग्रस्त होकर इस अवसरवादी गठबंधन के लिए विवश होते हुए स्पष्ट दिखाई पड़े ........
27 साल यूपी बेहाल के नारे के साथ पिछले महीनों जब कांग्रेस ने प्रदेश के चुनाव प्रचार की शुरुआत की तो उसने न सिर्फ सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व के कई कार्यकाल के काम पर असंतोष और सवालिया निशान लगाया बल्कि अखिलेश यादव के 5 साल के काम को भी खोकला बताते हुए अस्वीकार किया ......लेकिन अति आत्मविश्वास में मदमस्त भाजपा को यूपी की सत्ता की ओर बढ़ते हुए देख कर कांग्रेस नेतृत्व ने घुटने पर बैठकर अपने इतिहास का सर्वाधिक विवशता भरा समझौता या सौदा किया .....जिसमें दूसरे पक्ष ने लगातार उन्हें अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी .....
इस उम्मीद के साथ कि लंबे समय तक पूरे देश की राजनीति में केंद्रीय और राज्य की सत्ता में वर्चस्व रखने वाला यह दल उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए उसी दल का सहारा लेकर ही कुछ संजीवनी प्राप्त कर ले .....जिस पर लगातार भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ाने का आरोप लगाते रहे..
कांग्रेस को शायद यह एहसास हो गया कि प्रदेश में लंबे समय से सत्ता सुख से वंचित उस के पदाधिकारी और कार्यकर्ता अब और अधिक सिद्धांत और संगठन को फ्री में धक्का लगाने के लिए राजी नहीं ....उन्हें भी सरकार की चमक दमक का कुछ हिस्सा चाहिए ....और इस प्रयोजन के लिए उससे भी हाथ मिलाया जा सकता है जिससे लंबे समय तक राजनैतिक विरोध और विवाद रहा .....
वही समाजवादी विचारधारा ने तो जन्म ही गैर-कांग्रेसवाद के खिलाफ लिया था डॉक्टर लोहिया हो.... जनेश्वर मिश्र या खुद निर्वासित राष्ट्रीय अध्यक्ष अथवा संरक्षक मुलायम सिंह वह सभी कांग्रेस की बुराइयां बताते-बताते बड़े नेता बने और कई बार सत्ता तक पहुंचे ......
कांग्रेस के परिवारवाद की लंबे समय तक आलोचना करते रहे .....खुद भी परिवारवाद मैं लिप्त हुए..... और उसी के शिकार होकर अपमानित भी हुए .....लेकिन उनके आधुनिक और संशोधित संस्करण के रूप में सामने आए युवा नेतृत्व ने भी सिद्धांतों को तिलांजलि देने में देर नहीं लगाई .......सत्ता प्राप्ति के संभावित मार्ग पर सफर जल्दी करने के लिए उस अच्छे लड़के का हाथ पकड़ा जो उन पर ही यूपी को बेहाल करने का आरोप लगा रहा था
इतना ही नहीं कुछ दिनों पहले तक अपनी सरकार की तमाम उपलब्धियों के सहारे फिर से चुनाव में उतर के बहुमत पाने के आत्मविश्वास को गवाते हुए उस दल का सहारा लिया जो लगातार पिछले कई चुनावों में में उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने पिछले प्रदर्शन से भी कमजोर प्रदर्शन कर रहा है और जनता का समर्थन लगातार गवा रहा है ......
पिछले चुनाव में समाजवादी क्रांति रथ पर आत्मविश्वास से लबरेज जो युवा नेतृत्व था वह इस चुनाव के विजय रथ पर दो व्यक्तित्व के बीच बट चुका है और दोनों भयग्रस्त होकर एक दूसरे के नेतृत्व को सहारा देने की कोशिश में है .....
कुल मिलाकर पिछले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति राजनैतिक अवसरवाद की प्रयोगशाला के रूप में दिखाई पड़ रही है .
.....एक दूसरे को नकारात्मक व्यंग के साथ अच्छे लड़के कहने वाले विरोधी विचारधारा के नेताओं ने हाथ पकड़कर एक गाड़ी की छत पर सवार होकर यूपी की जनता से पूछे बगैर ही या घोषित कर दिया है कि यूपी को यह साथ पसंद है लेकिन चुनावी नतीजों के बाद ही यह बात स्पष्ट हो पाएगी की राजनैतिक अवसरवाद और सिद्धांतों की सामूहिक हत्या से उपजे इस सत्तालोलुप सौदेबाजी या राजनैतिक गठबंधन को यूपी का साथ मिलता है या नहीं......
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर ...
दीपक मिश्रा बाराबंकी के टेलीविजन पत्रकार हैं ।

No comments:
Post a Comment