फतेहपुर, शमशाद खान । आगामी 23 फरवरी को सम्पत्र होने जा रहे विधान सभा चुनाव की तैयारी के लिए सभी दलों के प्रत्याशी कड़ी मेहनत के साथ गांव-गांव जाकर जहां वोट मांगग रहे है, वही मतदाताओं की समस्याओं से जूझना भी पड़ रहा है क्योकि इस समय मतदाता तरह तरह के सवाल दाग रहे है। आगामी विधान सभा का चुनाव दिन प्रतिदिन अपने शबाब पर चढ़ता जा रहा है और सभी मुख्य दलों के प्रत्याशी मतदाताओं का समर्थन पाने के लिये उन्हें रिझाने का तरह-तरह के प्रयास कर रहे है। इस बार मतदाताओं का रूख अभी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है। रूख स्पष्ट न होने के कारण मतदाता सबका सम्मान व सब को वोट देने का वायदा बराबर कर रहे है। इस बार के चुनाव में मतदाता सभी प्रत्याशियों से खुश कम है और परेशान ज्यादा हो रहे है। मतदाता इस बार अपने दरवाजे पर आने वालों को कतई यह आभास नहीं होने दे रहे है कि वह उन्हें वोट नहीं देंगे। सभी मुख्य पार्टियों के जातीय समीकरण फेल हो रहे है। क्योकि एक मुख्य दल को छोड़कर शेष सभी दलों के परम्परागत वोटों में बिखराव हो रहा है। हर दल मे ंसही प्रत्याशी को टिकट न मिलने से बगावत हो रही है और चुनाव में धीरे धीरे वोटों का बिखराव होता जा रहा है। मुस्लिम मतदाता अभी अपना पत्ता नहीं खोल रहा है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे वैसे बहुसंख्यक वोटरो का विखराव होता जा रहा है। जो पिछली बार चुनाव जीतकर इस बार भी मैदान में है उन्हें मतदाताओं के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। इस बार सबसे बड़ी दिक्कत अल्पसंख्यक मतदाताओं के सामने है क्योकि वह अभी तक यह नहीं तय कर पा रहे है कि दो में से कौन जीत रहा है और किस पार्टी में भाजपा को हारने व सरकार बनाने की ताकत है। सपा व कांग्रेस का गठबंधन एक चर्चा का विषय बना हुआ है। और मतदाता इन दोनों के साथ बसपा को मुस्लिम पे्रमी मान रहा है। चुनाव का दूसरा मूद्दा कर्जमाफी मतदाताओं में चर्चा का विषय बना हुआ है। मतदाता इस विषय पर गंभीरता से विचार कर रहा है। आम मतदाताओं में इस बात का भी विचार हो रहा है कि कर्जमाफी का वायदा कौन सा दल पूरा कर सकता है। इकसे साथ ही मतदाता प्रत्याशी के चरित्र व व्यवहार के सम्बंध में आपस में चर्चा कर रहा है। इस चुनाव में नोटबंदी को भी चुनावी मुद्दा बनाया गया है। इसका कोई खास असर होगा या नही यह चुनाव परिणाम से पता चलेगा। वैसे मजदूर वर्ग के लोग नोटबंदी के प्रति नाराजगी जाहिर कर रहे है। और मतदाता जाति पात के साथ की जगह अपने हित अनहित को सोच रहा है। चुनाव आयोग की लाख सख्ती के बावजूद मतदाताओं को खरीद फरोख्त शुरू हो गयी है और ठेकेदारी ने ठेका लेना शुरू कर दिया है। चुनाव आयोग ने भले ही चुनाव खर्च तय करके प्रत्याशियों को बाॅध दिया हो लेकिन प्रत्याशी आयोग को धता बताकर चुनाव जीतने के लिये पानी की तरह पैसा खर्च कर रहे है। आयोग से चोरी करके पर्चे पोस्टर छपवाकर बांटे जा रहे है और कई जगहों पर बरामदगी भी हो चुकी हैं। इस चुनाव में मतदाताओं की चुप्पी प्रत्याशियों की नींद हराम कर रही है। और चुनावी ऊॅट किस करवट बैठेगा यह मतगणना के बाद ही मालूम हो सकता है।
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